हमारे शब्द ही सुख-दुख का निर्माण करते है

9:44 am or July 14, 2019
हमारे शब्द ही सुख-दुख का निर्माण करते है
महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १४ जुलाई ;अभी तक;  शिल्पी के हाथों से पत्थर, कुम्हार के हाथों से मिट्टी, शिक्षक के हाथों से शिष्य व गुरू के हाथों से श्रावक की तकदीर बादल जाया करती है। अतः हम जहाँ भी जाए वहाँ से कुछ अवश्य पाए। गृहस्थ अपने जीवन में सभी सुख सुविधाएं मिले व सभी मनोकामनाएं पूरी हो ये भावना रखता है किन्तु धर्म साधना, पूजन, भक्ति भाव से नहीं करता यदि मन लगाकर धर्म साधना की जाय तो जीवन मेें लक्ष्मी को आने से कोई रोक नहीं सकता।
उक्त विचार 108 मूर्ति श्री संबुद्धसागरजी ने सन्मतिकुंज में आयेाजित महती धर्मसभा में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि हम सब धर्म के खिलाड़ी है और हमारे बेट के सामने धार्मिक गतिविधियों की गेंदे है, हमें चोके, छक्के लगाते हुए रन बनाना है। रन न भी बने तो खेलना नहीं छोड़। मन के भाव अच्छे रखे, जीवन में कोई कमी नहीं होगी।
हमारे शब्द ही सुख-दुख का निर्माण करते है

हमारे शब्द ही सुख-दुख का निर्माण करते है

इस अवसर पर 108 मुनि श्री सर्वाधसागरजी ने कहा कि हमारे द्वारा किये गये कार्यों का फल हमें अवश्य मिलता है। हमेशा अच्छे कार्य करें, अच्छा करोगे, अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे बुरा फल मिलेगा। जो मिले उसी में सुख की अनुभूति करें। तीर्थ स्थानों पर खान पान का त्याग करें। पर्यटन का भाव लेकर यात्रा नहीं करें।

                कार्यक्रम की शुरूआत अजय बाकलीवाल द्वारा चित्र अनावरण कर की गई, दीप प्रज्जवलन, राजकुमार बाकलीवाल द्वारा पाद प्रक्षालन विजेन्द्र सेठी परिवार द्वारा किया गया। शास्त्र भेंट राजमल गर्ग व सुधीर जैन ने किए। मंगलाचरण कोमलप्रकाश जैन ने किया। संचालन रचना डोसी ने किया एवं आभार अशोक चयन ने माना।

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