गंगा कोई साधारण सरिता नहीं हमारी पूज्य माँ है और जल साधारण जल नहीं साक्षात अमृत है- डॉ. नारायण चैतन्यजी महाराज

2:48 pm or June 12, 2019
गंगा कोई साधारण सरिता नहीं हमारी पूज्य माँ है और जल साधारण जल नहीं साक्षात अमृत है- डॉ. नारायण चैतन्यजी महाराज
महावीर अग्रवाल
 मन्दसौर १२ जून ;अभी तक;  गंगा अवतरण दिवस गंगा दशमी पर्व तेलिया टेंक स्थित श्री ऋषियानन्द आश्रम पर वृन्दावन श्री वामदेव पीठ वृन्दावन के पूज्य संत डॉ. नारायण चैतन्यजी महाराज के सानिध्य में मनाया गया। प्रारंभ में गंगा मंदिर में मॉ गंगा के श्रीविग्रह का पूजन, अभिषेक, आरती की गई।
डॉ. नारायण चैतन्यजी महाराज ने गंगा मंे जिस प्रकार भागीरथ की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर स्वर्ग से ब्रह्मा के कमण्डल में और वहां से शिवजी की जटा में प्रवेश किया और फिर वहां से धरती पर पर्दापण होने की कथा सुनाते हुए कहा कि गंगा अन्य नदियों की तरह साधारण सरिता न होकर हमारी पूज्य माँ है और गंगा जल साधारण जल न होकर साक्षात अमृत तुल्य है जो वर्षों तक  पात्र में भरा रहने पर भी कभी बिगड़ता नहीं, खराब नहीं होता, समाप्त नहीं होता। शुद्ध और पवित्र बना रहता है। गंगा जल खराब न होने का कारण की वैज्ञानिक हमेशा खोज करते रहे है परन्तु इसका पता अभी तक नहीं लगा पाये है।
गंगा कोई साधारण सरिता नहीं हमारी पूज्य माँ है और जल साधारण जल नहीं साक्षात अमृत है- डॉ. नारायण चैतन्यजी महाराज

गंगा कोई साधारण सरिता नहीं हमारी पूज्य माँ है और जल साधारण जल नहीं साक्षात अमृत है- डॉ. नारायण चैतन्यजी महाराज

यह पावन भारत भूमि है जहां गीता, गंगा और गायत्री को पुस्तक, नदी, मूर्ति न समझकर जन्मदात्री पूज्य मॉ के समान पालन पोषण करने वाली मॉ ही माना गया है।

              आपने कहा कि अच्छे बुरे व्यक्ति की पहचान उसकी आँखों से हो जाती है। आंखे वह आयना है जो झूठ बोलने वाले की तथा सच बोलने वाले की पहचान करा देती है।
                 आपने कहा कि जीवन में चाहे कैसी भी भूल हो जाये पत्नी को पति से और पति को पत्नी से कभी नहीं छुपाना चाहिये। इससे दम्पत्ति में परस्पर प्रेम व स्नेह बना रहता है।
                 आपने कहा कि गीता के अनुसार अन्तकाल में जो जिस भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, अगले जन्म में उसे वैसा ही शरीर प्राप्त होता है। इसलिये अभ्यास यह होना चाहिये कि हमेशा जीवन में अच्छे दृश्यों, अच्छे प्रसंगों का और सर्वोपरी भगवन नाम का स्मरण होते रहना चाहिए, जो अन्त समय में काम आये।
                महेश गेहलोद ने मधुर स्वर से मॉ गंगा पर रचित रिषियानन्दजी का प्रसिद्ध स्तुति भजन- ‘‘मॉ गंगा लहर बही कैसे धीरे-धीरे’’ सुनाया।
संचालन सचिव ओमप्रकाश सोनी ने किया आभार अध्यक्ष ओमप्रकाश पोरवाल ने माना। अंत में प्रसादी भण्डारा हुआ जिसमें बड़ी संख्या में उपस्थित होकर श्रद्धालुओं ने प्रवचन और प्रसाद का लाभ लिया।
                  उल्लेखनीय है कि गंगा ब्रह्मनिष्ठ सिद्धसंत स्वामी रिषियानन्द सद्गुरू देव की ईष्ट रही है। वे गंगा के परम् उपासक थे। वरिष्ठजनों के अनुसार भगवान द्वारा पोस्टमेन बनकर डाक बांट ने के प्रसंग पर तत्काल मंदसौर से पोस्टमेन के पद को त्यागकर ग्रहस्थाश्रम को छोड़कर आपने चुपचाप कई वर्षों तक एकान्त में गंगा किनारे रहकर कठिन तपस्या की। गंगाजी एक प्रकार से उनके लिये जन्म देने वाली मॉ से बढ़कर थी। स्वामीजी ने स्वयं अपने जीवन की एक सच्ची घटना सुनाते हुए कहा था कि इस एक बार तीन संतों के साथ प्रातः जंगल में भ्रमण और सत्संग करते हुए गंगा से बहुत दूर निकल गये और रास्ता भटक गये। मध्यान्ह को सूर्य की तपन और दूसरी तरफ भूख प्यास से जब व्याकुल हो गये और जब कोई आसरा न दिखा, मीलो तक कहीं कोई बस्ती अथवा गांवों का नामोनिशान नहीं था, चलना भारी पड़ रहा था तब उस घोर जंगल में दूर से उनको पीछे से दोड़ती हुई एक माई आई की रूकने के लिये आवाज आई। वह हाफती हुई उनके पास आई उसके सिर पर टोपले में मोटी-मोटी बाजरे की रोटियां और कोंदों (एक प्रकार की सब्जी) तथा हंडिया में ताजा मट्ठा भरा हुआ था। वह सब संतों को परोसकर जिधर से आई उधर चल पड़ी और देखते ही देखते ही आंखों से औंझल हो गई। किसी को पता नहीं चला कि वह कहां से आई थी और कहां चली गई। तब स्वामीजी ने कहा कि वह मॉ और कोई नहीं थी, साक्षात गंगा मॉ थी जो हमारे कष्ट को देखकर प्रकट हो गई। वास्तव में इस घटना पर किसी को अविश्वास भी नहीं होना चाहिए क्योंकि महापुरूष कभी मिथ्या भाषण नहीं करते इसके पीछे जैसा कहा है ‘‘विश्वासम् फलदायकम्’’ जहां सच्ची श्रद्धा, भक्ति और विश्वास होता है वहां भक्त प्रहलाद को बचाने की तरह नरसिंह रूप में भगवान जड़ खम्बे में से भी प्रकट हो जाते है। शर्त यही है कि हमारी लगन और प्रेम श्रद्धा विश्वास अटूट होना चाहिए।
                 उपस्थित रहे- ट्रस्ट अध्यक्ष ओमप्रकाश पोरवाल, उपाध्यक्ष डॉ. रविन्द्र जोशी सचिव ओमप्रकाश सोनी, सहसचिव मास्टर भेरूलाल पाटीदार, कोषाध्यक्ष कन्हैयालाल सोनी, ट्रस्टीगण राजेश पोरवाल, भेरूलाल पाटीदार, जेठालाल चंदवानी, बंशीभाई चंदवानी, अशोक पाठक, काशीभाई चंदवानी, रामगोपाल शर्मा आदि

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