दलबदलुओं के कारण 2 बार टिकट से वंचित हुए ज्ञान सिंह

3:01 pm or March 24, 2019
दलबदलुओं के कारण 2 बार टिकट से वंचित हुए ज्ञान सिंह

मोहम्मद सईद

शहडोल  24 मार्च ; अभी तक; चुनाव की तारीखों का ऐलान हो जाने के बाद इस आदिवासी संसदीय क्षेत्र में भी राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों ने अपने अपने प्रत्याशियों के नामों को घोषित कर दिया है। केंद्र में सत्ता में होने के कारण ज्यादा चर्चा भाजपा की ही हो रही है। भाजपा की चर्चा इसलिए भी ज्यादा हो रही है क्योंकि भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद ज्ञान सिंह का टिकट काट दिया है।

दलबदलुओं के कारण 2 बार टिकट से वंचित हुए ज्ञान सिंह

दलबदलुओं के कारण 2 बार टिकट से वंचित हुए ज्ञान सिंह

भाजपा में टंªप कार्ड माने जाने वाले कद्दावर आदिवासी नेता ज्ञान सिंह को दो बार दलबदलुओं के कारण सांसद रहते हुए टिकट से वंचित होना पड़ा है। पहली बार जनता दल यूनाइटेड से भाजपा मंे शामिल होने वाले दलपत सिंह परस्ते ने सांसद ज्ञान सिंह को टिकट से वंचित किया, तो दूसरी बार अब चंद दिन पहले ही कांग्रेस से भाजपा में आने वाली श्रीमती हिमांद्री सिंह ने उन्हें बैरंग कर दिया। भाजपा के तजुर्बेकार इस आदिवासी नेता की राजनीति में यह बात भी महत्वपूर्ण है, कि वे तीन बार सांसद तो रहे लेकिन तीन बार सांसद रहते हुए वे पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। इस बार टिकट से वंचित हो जाने के बाद राजनीति के जानकारों का मानना है, कि इस कद्दावर आदिवासी नेता को भाजपा ने राजनीतिक वनवास में भेज दिया है।
              भाजपा की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले आदिवासी नेता ज्ञान सिंह को भाजपा का टंªप कार्ड इसलिए माना जाता है, क्योंकि जब-जब भी भाजपा में प्रत्याशी को लेकर असमंजस की स्थिति निर्मित हुई भाजपा ने ज्ञान सिंह को ही आगे किया। शहडोल संसदीय क्षेत्र का इतिहास गवाह है, कि यहंा से भाजपा लगातार पराजय का स्वाद चखती रही। 1996 में भाजपा ने यहां ज्ञान सिंह को मैदान में उतारा और भाजपा का यह निर्णय टंªप कार्ड साबित हुआ। 1996 में पहली बार भाजपा प्रत्याशी के रूप में ज्ञान सिंह ने विजय हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता दलबीर सिंह को शिकस्त दी। लेकिन राजनीतिक उठपटक के कारण जल्द ही वर्ष 1998 में फिर लोकसभा का चुनाव हुआ और इस बार फिर भाजपा ने सांसद ज्ञान सिंह को ही मैदान में उतारा। इस बार भी ज्ञान सिंह ने जीत हासिल की। लेकिन दो बार जीत हासिल करने के बाद भी 1999 में हुए चुनाव में भाजपा ने अपने सांसद ज्ञान सिंह की टिकट काट दी। ज्ञान सिंह की टिकट काट कर भाजपा ने जनता दल यू से पार्टी में प्रवेश लेने वाले दलपत सिंह को प्रत्याशी घोषित किया।
वर्ष 1999 में टिकट से वंचित हो जाने के बाद ज्ञान सिंह ने प्रदेश की राजनीत का रूख कर लिया। 2003 के विधान सभा चुनाव में पार्टी ने प्रयोग करते हुए ज्ञान सिंह को उमरिया की सामान्य विधान सभा सीट से प्रत्याशी बनाया। भाजपा का यह प्रयोग बेहद सफल रहा और ज्ञान सिंह ने उमरिया की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले कांग्रेस नेता अजय ंिसह को करारी शिकस्त दी। नोटबंदी के बाद देश में पहला उपचुनाव शहडोल में वर्ष 2016 में हुआ, जिस पर देश भर के लोगों की निगाह लगी थी। इस उपचुनाव में एक बार फिर भाजपा ने अपना तुरूप का इक्का चला और कद्दावर आदिवासी नेता ज्ञान सिंह को मैदान में उतार दिया। ये उपचुनाव भाजपा के लिए किसी अग्निपरीक्षा के कम न था। लेकिन चुनौतीपूर्ण इस उपचुनाव मंे ज्ञान सिंह ने कांग्रेस की दमदार प्रत्याशी मानी जा रहीं सुश्री हिमांद्री सिंह को हार का स्वाद चखा दिया। वर्ष 1996, 1998 और 2016 का चुनाव जीतने के बाद भी सांसद ज्ञान सिंह पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके हैं।

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