प्रदेश सरकार बेदखली आदेश पर सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करे- विधायक अशोक मर्सकोले

5:49 pm or February 24, 2019
बेदखली आदेश पर सरकार पुनरयाचिका दाखिल प्रदेश सरकार करे- विधायक अशोक मर्सकोले
सलिल राय
मंडला २४ फरवरी ;अभी तक; मध्यप्रदेश के मण्डला जिले की निवास विधानसभा के कांग्रेस विधायक डॉ अशोक मर्सकोले ने जानकारी देते बतलाया कि 13 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय सुरक्षित निर्णय 20 फरवरी को जो निर्णय आया है उसमें वनवासियों के वन अधिकार के सामूहिक दावे को निरस्त किये जाने से जबलपुर सम्भाग के मण्डला सहित सभी जिलों में इस फैसले से राजनीति के गलियारों में हलचल तेज हो गई हैं। इस निर्णय के विरुद्ध मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के आज उमरिया प्रवास पर डॉ अशोक मर्सकोले ने एक लिखित आवेदन मुख्यमंत्री को देकर यह मांग की गई है कि प्रदेश शासन इस निर्णय के विरुद्ध पुनर्विचार याचिका लगाये जिससे जल जंगल जमीन से सीधा नाता जोड़े वनवासियों को उनको बेदखल न किया जाये . आज मुख्यमंत्री को उमरिया में उक्त बेदखली के निर्णय पर पुनर्विचार याचिका की मांग को लेकर डॉ मर्सकोले के बताये अनुसार जिन विधायको की मौजूदगी रही उनमे नारायण सिंग पट्टा  बिसाहू लाल सुनील सराफ बसन्त सिंह फुन्दे लाल मार्को के साथ प्रदेश कबीना के आदिमजाति कल्याण मंत्री ओमकार सिंह मरकाम भी शामिल रहे।
                   यहां यह बता दे इस निर्णय से असहमत नर्मदा बचाओ आंदोलन और समाजसेवी जबलपुर के राजकुमार सिन्हा ने भी अपनी बात यहाँ उठाई हैं।
बेदखली आदेश पर सरकार पुनरयाचिका दाखिल प्रदेश सरकार करे- विधायक अशोक मर्सकोले

बेदखली आदेश पर सरकार पुनरयाचिका दाखिल प्रदेश सरकार करे- विधायक अशोक मर्सकोले

यहाँ जबलपुर सम्भाग के जिलों की सरजमीं से जुडी कुछ जानकारी भी यहाँ दी गई हैं जिसमे 2008 में  सर्वोच्च न्यायलय में याचिका कुछ वनजीवो के संरक्षणकर्ताओ ने वन जीवो की नैसर्गिक रहवास  स्थलीय जंगलो में जनाबादी की बसाहट से वन प्राणियों के स्वच्छंद जीवन विचरण का मुद्दा रखा गया था।

                     इस निर्णय से जनप्रतिनिधियों जिसमे खासकर वन बाहुल्य विधानसभाओ से जुड़े जनप्रतिनिधियों में इलाके के वनवासियों के दावे निरस्त के साथ बेदखली के आदेश से खलबली के परिदृश्य सामने आ रहे हैं। इस को लेकर जो जानकारी दी गई है, उसके सार संकलन में इस तरह बताई गई हैं ।
आज  मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र लिखकर उच्चतम न्यायालय द्वारा 13 फरवरी 2019 को आदेश दिया है कि  वनभूमि पर काबिज आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों के अमान्य दावेदारों को बेदखल किया जाए ।उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री को अवगत कराया है कि इस आदेश को लेकर आदिवासी अंचलों में व्यापक असंतोष एवं नाराज़गी है ।क्षेत्र में कानून वयवस्था पर भी असर होना संभावित है ।अतः प्रदेश के व्यापकहित में राज्य सरकार उच्चतम न्यायालय में पुनरयाचिका दायर करे।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के राज़ कुमार सिन्हा ने महाकोशल एवं प्रदेश में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन पर सवाल करते हुए कहा कि
महाकोशल के 8 जिलों में 30 जुन2017तक आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों  द्वारा कुल 75 हजार 637 दावे लगाए गए जिसमें से 35 हजार 907 दावे अमान्य किया गया ।आदिवासी मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी निर्देश दिनांक 12 जुलाई 2012 के अनुसार सभी अमान्य दावों को निरस्त करने के कारण सहित लिखित में प्रत्येक दावेदार को देना सुनिश्चित किया जाए ।जिससे दावेदार उपर की समितियों में 60 दिन के अंदर अपील कर सके ।परन्तु इस तरह की लिखित सूचना दावेदार को आज दिनांक तक प्राप्त नहीं है ।इस कारण दावेदार अपील करने की अपने संवैधानिक अधिकार से बंचित रह गये  ।दूसरी ओर प्रदेश में लगभग 3 लाख 54 हजार दावे अमान्य हुए हैं, ये भी जिला स्तरीय समितियों द्वारा एकतरफा निर्णय है ।जबकि सभी दावों को मान्यता प्राप्त वन अधिकार समिति, ग्राम सभा तथा एसडीएम (राजस्व) ,एसडीओ (वन),एसडीओ (आदिवासी विभाग) एवं  तीन जन प्रतिनिधियों की उपखंड समिति ने भौतिक सत्यापन की अनुशंसा के साथ जिला स्तरीय समितियों को अंतिम निर्णय के लिए भेजा था।उपरोक्त तीनों समितियों के निर्णय को जिला स्तरीय समितियों द्वारा निरस्त करना नौकरशाहों के कार्य पद्धति पर सवाल खङा करता है ।
                  ड़ॉ अशोक मर्सकोले ने यह भी जानकारी दी हैं कि आगामी 27 फरवरी इस मुद्दे को लेकर मण्डला में आदिवासी महापंचायत गढ़ा मण्डला में सड़कों में उतरेगी।

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