वन भैंसा के बाद अब  लुप्त हो गई बस्तर मैना

राजेंद्र तिवारी

बस्तर (जगदलपुर )  ८ नवंबर ;अभी तक;  छत्तीसगढ़ राज्य जब सन् 2000 में अस्तित्व में आया तब दिल्ली में बस्तर की पहचान छत्तीसगढ़ से ज्यादा थी । लेकिन राज्य बनने के बाद बस्तर की पहचान दांव पर है । क्षेत्रफल में केरल  राज्य से भी बड़ा  बस्तर अब सात जिलों में विभाजित हो चुका है। असली बस्तर जिला कौन सा है ? अब यह  बेतुका हो चुका है।

वन भैंसे बस्तर में बहुत हुआ करते थे ।वन भैंसों की सींगे लोग अपने घरों में सजाया करते थे ।लेकिन आज वन भैंसे से कहीं दिखाई नहीं पड़ते ।यही हाल बस्तर मैना का हुआ। वन विद्यालय के पिंजरे में कैद इकलौती मैना पिछले पखवाड़े मर चुकी है। अब इस पक्षी को केवल तस्वीरों में देखा जा सकता है। सन् 1989 में भारतीय  वन सेवा के अधिकारी पंकज श्रीवास्तव ने बस्तर मैना को बचाने की गंभीर पहल की थी ।बस्तर मैना के संवर्धन के लिए उन्होंने एक सस्ती सी परियोजना बनाई थी। पंकज श्रीवास्तव उस समय कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के संचालक के पद पर तैनात थे ।उनके तबादले के बाद इस पक्षी के संवर्धन के वन विभाग ने गंभीर पहल कम  और प्रचार पाने की कोशिश ज्यादा की।  बस्तर मैना को ईस्टर्न हिल मैना के नाम से भी जाना जाता है।

मशहूर पक्षी वैज्ञानिक डॉक्टर सलीम अली द्वारा  1972 में प्रकाशित पुस्तक हैंडबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान में बस्तर मैने का  विस्तार से वर्णन किया गया है। छत्तीसगढ़ बनने के पहले बस्तर के छोटे डोंगर, बारसूर ,बैलाडीला, तिरिया ,कोलेंग वो पुष्पाल क्षेत्र में मैना आसानी से देखी जा सकती थी। इस पक्षी की खासियत यह है कि यह मनुष्य की बोली की नकल हुबहू कर देती है  । एक जमाने में वह मुहावरा भी खूब प्रचलित हुआ था जो भोपाल में यह कह कर सुनाया जाता था कि बस्तर के आदिवासी नहीं बोलते वहां की मैना बोलती है  । कुल मिलाकर राज्य बनने के बाद बस्तर के पहचान वाले चिन्ह  एक-एक कर गायब होते चले जा रहे हैं ।यह चिंता का विषय है।

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