कहीं सुविधाओं को मोहताज न हो जाये छोटे कॉलोनियों के प्लाटधारी 

महावीर अग्रवाल, मन्दसौर
मन्दसौर 12 अक्टूबर  ; अभी तक;  म.प्र. के अंतिम छोर पर राजस्थान की सीमाओं से लगा देश का प्रमुख अफीम उत्पादक जिला मंदसौर का मंदसौर शहर अवैध कॉलोनियों की बसाहट में अग्रणी भूमिका में रहा हो तो कोई नई या अट्रेक्ट करने जैसी बात नहीं होगी। विभिन्न मूलभूत और सुख सुविधाओं से वंचित इन कॉलोनियों में कम कीमत के नाम पर उंची कीमतों पर प्लाट लेकर मकान बनाकर बड़ी संख्या में लोग रहने लगे किन्तु सड़के और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिये आज तक ये तरस रहे है। हॉ इनमें प्लॉट लेकर लोगो ंने भूमाफियाओं की झोली जरूर भर दी होगी जो बदस्तुर जारी है। यह अभी 2 हेक्टर में कॉलोनी बनाने के नाम पर सरकार ने कॉलोनाईजरों को झोली भरने और बेशुमार काला धन इकट्ठा करने का मौका फिर दे दिया है।
                   मंदसौर देश का जाना पहचाना ऐसा धनाढ्य शहर इस मायने में कहा जा सकता है कि यहां देखते ही देखते या पलक झपकते ही बेशुमार दौलत और अपार काले धन में ऐसे दस्तक दी कि अब उसका चंद लोगों के हाथों से निकलना मुश्किल है। इन दिन दशकों में अफीम और फिर स्मैक व डोड़ेचुरे की तस्करी ने ऐसा ताना बाना बुना कि तस्करी के बेशुमार काले धन ने जमीनों पर कब्जा जमाया और फिर जमाना तेजी से आगे बढ़ा। जमीनों के आसमान छूते भावों ने ऐसा माया जाल का बिछोना बिछाया की महंगे दामों की जमीनें और प्लॉटों की कीमतों ने बेशुमार काले धन को खुब प्रोत्साहन मिला।
                   जमीनों और प्लाटों के खरीदी और विक्रय में काले धन के कदम इस तेजी से बढ़े की आज तक थमने का नाम नहीं ले रहे है। बात यदि इसके प्रमाणिकता की ओर राज्य और केन्द्र सरकार के नियम काम करते तो शायद आज जो अपार काला धन हागकांग या देश के दिल्ली-मुंबई से यहां महंगी जमीनों की स्थिति से अवगत होता तो नहीं हो पाता।
                      अनाप शनाप कॉलोनियों व इनमें आग बरसती प्लाटों कीमत तो आज भी कोई सुनेगा तो शायद वह भी कान में उंगलियां डाल लेगा। जैसे प्लॉटों कीमतों को लेकर आज यहां चर्चा है कि कहीं दुरस्त कॉलोनी में भी वो वैध या अवैध कोई इनमें प्लॉट लेने की इच्छा व्यक्त करता है तो वहां भी मूल भूत सुविधाओं की बात किये बिना 2 से 5 हजार रू. फीट प्लॉटों की कीमत बताइ्र जाती है। अब शहर के बीच भाग में जमीन की कीमत की बात करेेंगे तो यह वहीं व्यक्ति बात कर पायेगा जो करोड़ों रूपयों से ओतप्रोत है।
रही-सही काले धन को फिर प्रोत्साहित करने और बिना मूल भूत सुविधाओं व चौड़ी सड़कांे की कॉलोनियों के सपनों को चकनाचुर कर फिर मध्यप्रदेश की सरकार ने मात्र दो हेक्टर जमीन पर कॉलोनी निर्माण की अनुमति देकर जनता पर ज्यादतियों का पहाड़ थोप दिया है। कॉलोनाईजर (भूमाफिया तो पहले से ताक लगाये नये-नये रास्ते ढूंढकर अपने काम को भ्रष्टाचार और अधिकारियों से सांठगांठ कर सुनियोजित तरीके से अंजाम देने के तौर तरीके अपना ही रहा था। नीमच के टी.एन.सी. विभाग ने भी ऐसी कई मंजुरिया भी दी जिनमें पार्किंग की जगह उंट के मुंह में जीरे के समान वह स्थान साबित हो यातायात में समस्या खड़ी कर ही रहा है। यह सब मध्यप्रदेश की सरकार के सम्मुख नियम-कानून-कायदे के दायरे में बता लोगों के लिये सरदर्द बने हुए हैं । ऐसे में सरकार के दो हेक्टर में कॉलोनी बनाने का निर्णय क्या लोगों के लिये व शहर के भविष्य के लिये उचित कहा जा सकता है।
                              सरकार के दो हैक्टर में कॉलोनी के निर्माण में क्या गरीबों के लिये,कम्यूनिटी हॉल के लिये, स्कूल आदि की सुविधाओं के लिये कॉलोनाईजर जगह छोड़ेगा ? क्या कॉलोनाईजर दो से 5 हजार रू. फीट में प्लॉट बेच रहे है तो क्या इसी भाव में वह रजिस्ट्री करवा रहे है ? और करवायेंगे ? क्या ऐसी कॉलोनियों में सड़के चोड़ी रखी जाएगी जो कि भविश्य के लिये अतिआवश्यक हैं। सरकार फिर ताल ठोककर काले धन को इकट्ठा करवाने में दो हेक्टर की कॉलोनी के निर्माण की अनुमति देती है तो खुद सरकार इस मामले में कठघरे में खड़ी होगी। मंदसौर में पहले से ही महंगे दामों में प्लॉट बेचे जाकर गाईड लाईन से रजिस्ट्री को हरी झंडी मिली हुई है और इस स्थिति में मंदसौर में अपार काला धन कभी पुरातत्व रूप में या जमीनों की खरीदी में सामने आता है तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
                         मंदसौर में अभी भी सरकार के दोहेक्टर में कॉलोनी बनने से पहले कई ऐसे मामले छोटी छोटी कालोनी के जन्म लेकर उंची कीमत में कुछ प्लाटों की बिक्री कर शेष प्लॉट फिर रीसेल में उंची कीमतों में बेचे जाने का सिलसीला थमा नही ंहै। शासन और कलेक्टर को चाहिए कि रजिस्ट्रार का सख्त और स्पष्ट निर्देश देकर बिना कॉलोनी के लायसेंस और रेरा की अनुमति तथा नक्शा स्वीकृति के बिना और वास्तविक विक्रय मूल्य पर दस्तावेज पंजीयन किये जायेंगे ऐसा संभव हो तो ही यह सब उचित हैं। जहां मंदसौर में ऐसी छोटी-छोटी कॉलोनियों के नाम पर भारी कीमतों पर बैचे जा रहे प्लॉटों की आय से जहां कालाधन इकट्ठा नहीं हो पायेगा वहीं लोगों को भी मूलभूत सुविधाओं वाली कॉलोनी से अंधेरे में रहकर वंचित नहीं रहना पड़ेगा।
                    कॉलोनी के नाम पर छोटी-छोटी कई कॉलोनियां गर्भ में होकर भारी कीमतों पर उनके प्लॉटों के सौंदे हो गये हो और कई प्लॉटांे के महंगे दामों पर बैचकर अपार काले धन को जमा करने का मार्ग बना रखा हो तो इसके लिये मध्यप्रदेश शासन और जिला प्रशासन को सतर्क होकर पंजीयन विभाग को स्पष्ट निर्देश देना होंगे जहां कॉलोनी के नक्शे की स्वीकृति के साथ ही रैरा आदि के कागज पूर्ण होकर उनके आसपास की कॉलोनियो में प्लॉटों की भावों की जांच पड़ताल कर उतनी ही कीमत मे ंदस्तावेज पंजीयन कर शासन के आमदनी को बढ़ाना होगा। वही ंकाले धन को इकट्ठा होने से बचाने के लिये आयकर विभाग केा भी सतर्क होना होगा।

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